Women’s Day

She is  like a fresh breeze, makes your day.

She is like a soft seed, fragile but gives new life

She is like a pretty rose, steals beauty from the  moon.

She flows like a holy Ganga, where your final quest ends.

She is like a ” home” , shelter and final destination to rest.

She is like an iron pillar , strong and determined .

She is like a treasure hunt – all emotions reside here.

She is like a precious pen, you can not write your story without

She is like a salt in food – you can not live without

Her confusions and petty problems too empower others

Each day is Women’s Day but little space she gets to express

She is an answer – God exists and operates.

Dedicated to  Pretty Women Around – Today – Tomorrow and Always.

© Shalu Makhija 08/03/17

 

ये मुस्कुराहट

ये मुस्कुराहट तो ज़िन्दगी है

मुश्किल डगर आसान बना देती है ।

ये मुस्कुराहट तो चेहरे का नूर है
बड़ी शिद्दत से गम को जो छिपाती है ।

ये मुस्कुराहट तो अपनों का करार है
कितने अहेसास उसी में सिमट जाते हैं ।

ये मुस्कुराहट तो कातिलाना है
आँखों को ये जबाँ बना देती है ।

ये मुस्कुराहट तो उपलब्धि है
ग़म खा के भी नाराज़गी छिपा लेती है ।

ये मुस्कुराहट तो राज़दान है
कितनी गलतियाँ ऐसे ही निगल जाती है ।

ये मुस्कुराहट तो जवाब है
हज़ारों सवालों का जो दिल छेद जाते हैं ।

ये मुस्कुराहट तो नवाबी है
ना जाने कितनी दरारें यूँ ही भर देती है ।

ये मुस्कुराहट तो ज़िन्दगी है
मुश्किल डगर आसान बना देती है ।।

© Shalu Makhija 16-02-17 Continue reading

ऊँची उड़ान

संभल संभल के बहुत चल लिया
ऊँची उड़ान अब भरने दो ।

हिसाब किताब से मन भर गया
अब बेहिसाब कदम बढ़ाने दो ।

दिन-वार के मेल मिलाये
समय से परे अब जाने दो ।

नाप तोल के सीमा है बनायीं
असीम अविरत अब बहने दो ।

जाँच परख के हाथ मिलाये
बेफिक्र गलतियाँ अब करने दो ।

जज़्बातों को ना पहचाना
आज मेरी कलम को लिखने दो

जान पहेचान से दोस्त बनाये ।
अंजान राह पे अब जाने दो।

दिल की चाहत पे पेहरे लगाये
बेहद महोब्बत अब करने दो ।

किनारे पे नौका खूब चलायी
अब तो सफर पे जाने दो ।

कौन सा पल आखरी होगा
ऊँची उड़ान अब भरने दो ।।

© Shalu Makhija 14-02-17

जटिल सरलता…

 

मोती पिरोते पिरोते माला बनानी चाही थी
न जाना वो माला कब गले का फंदा बन गयी ।

एक एक तन जोड़के घोंसला बनाना चाहा था
ना जाना कब मैं अपने पँखो से उड़ना भूल गयी ।

यूँ उम्र गुज़ार दी उस मकड़ी ने वो जाल बनाने में
ना जाना था एक दिन वो खुद ही उसमें फस गयी ।

सहज जतन से जिन रिश्तों को सालों से निभाया था
न जाना कब वो मुझ से ही इख़्तिलाफ़ कर गए ।

सीप ने भी हौले हौले अपना कवच बनाया था
ना जाना वो कवच ही कब उसकी कब्र बन गया।

सींचती रही मैं विश्वास की हर एक डोर को
ना जाना समय ने कब मेरा विश्वास ही सोख लिया ।

सजाती रही जिंदगी मैं अनगिनत मुखौटों से
न जाना कब ‘सरलता ‘एक शब्द बन के रह गयी।

© Shalu Makhija 28-01-17

Welcoming New Year ..

A day passes by
A month rolls by..
2016 glides by..
What remains are moments
We lived we loved..

Neither Jan nor Feb puts smile on my lips
Neither 1st nor 2nd reminds me something special
What I cherish are moments
We shared together..

Routine will continue
Daily chores will not disappear..
What thrills are moments
We worked passionately…

Wishing you 2017 with lively, lovely moments full of joy, peace and prosperity.

© Shalu Makhija  🌺🌺 01-01-2017

मझधार के मोड़ पे

अजीब सी ये घुटन है
मन ये चाहे पंछी बन उड़ जाए
खुली हवाओं में पर फैलाएँ
पर बड़े उलझे से रास्ते हैं
बेबस हम किस आस में है
बड़ी तन्हा सी
ज़िन्दगी आजकल है।

लोगों की भीड़ है
हमसफ़र कोई नहीं
लफ़्ज़ों में दर्द है
सुनता कोई नहीं
आँखे जिसे ढूंढें
वो सहारा कोई नहीं
रिश्ते हज़ारों हैं
अपना कोई नहीं

शब्दों को हमने
लबों पे रोका है
आँसू भी बस अब
वहीँ पे ठिठके हैं
भीतर एक शोर सा है
दिल को जला रहा है
ना कमज़ोर दिखना चाहें
अजीब सी घुटन है
बड़ी तन्हा सी
ज़िन्दगी आजकल है।

यूँ तो हमने चाही
सपनों सी हकीकत
मुस्काते हुए चेहरे
और फुर्सत के वो दो पल
हँसी के ठहाके
तो दुःख में साझेदारी
धीमी सी रफ़्तार हो
पर रिश्तों का सहारा हो

सरल ये समझ
बेमानी लग रही है
हक़ की लडाई
हार से गए हैं
बहस में जीतने से
किनारा कर लिया
उम्मीद ने भी अब तो
दामन छुड़ा लिया
बड़ी तन्हा सी
ज़िन्दगी आजकल है ।।

© Shalu Makhija

Dedicated to sad moments where free powerful will takes back seat and allow the temperaments to rule.

सरहदें

सूरज अपना, चाँद भी अपना
हिचकौले लेता सागर भी अपना
अविरत अदभूत धरा भी अपनी
फिर क्यों सरहदों ने हमें बांटा ।

सही गलत की पहचान एक है
इंसानियत की भाषा एक है
माँ के दिल का प्यार समान है
हर धरम की वजह एक है
धरम के ठेकेदारोंने फिर क्यों हमें बांटा ।

ना कुछ लाये, ना ले जाना
यहाँ की दौलत यहीँ पे रहती
कर्मों के बंधन से ना कोई छूटा
रब ने तो समय एक सा बाँटा
फिर कौनसे अहम् ने आज हमें बाँटा ।

कोई जवाब ना आज मैं खोजूँ,
मुझे ना दिखाना कोई तर्क तराजू
देखूं जहाँ से गेंद सी दिखती
शिव की धरा ये हँसती – खेलती

सूरज अपना, चाँद भी अपना
फिर क्यों सरहदों ने हमें बांटा ।।

© Shalu Makhija

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Journey of Consciousness

ये सफर तो चेतना का, अकेले तय करना ।

भोर से साँझ की दूरी
दिल से साँस की दूरी
चाहत से इश्क़ की दूरी
खुद से खुदा की दूरी
विवेक व् सूझ बूझ से, स्वयं ही तय करना।

विचारों से रचना तक
मुराद से मुरीद तक
आशय से उद्देश्य तक
आभास से उजाले तक
कदम हो न्यायपूर्ण , बोध से बढ़ाना।

बागबाँ भी थकेंगे
हमसफ़र भी रुकेगा
रास्ते तो बदलेंगे
मंज़िलें जो मुख़्तलिफ़ हैं
रिश्ते ये दो पल के , निभा के आगे जाना।

ये दर्द आखिर क्यों है
ये फ़िक्र तुझे कैसी
भाग्य ने हाथ थामा
ज़िन्दगी दुआओं जैसी

लक्ष्य की डगर पे, संयम से है चलना।
ये सफर तो चेतना का, अकेले ही तय करना ।।

© Shalu Makhija

Life simplified……

छोटे से मतभेदों में
शब्दों की कड़वाहट में
तवज्जो के छलावे में
बुरा मानना छोड़ दिया है ।।

अनगिनत वादों में, बड़ी बड़ी बातों में
अंजान चेहरों में, जाने से कोहरे में
खबरों के इस ढेर में
सच झूठ नापना छोड़ दिया है ।।

मुख़ौटे से झाँकती आँखों में
भोली सी चतुराई में
कभी मजबूरी की लड़ाई में
सही गलत तलाशना छोड़ दिया है ।।

दिखावे की अँधी race में
चीज़ों से नापते आदमी के मोल में
दुनिया के मापदंड का
हिसाब रखना छोड़ दिया है ।।

सीधी बात, सच्चे काम में
दिल से जुड़े उन रिश्तों में
खुशियों को अनमोल जान के
उन्हें सहेजना सीख लिया है।।

©  Shalu Makhija

ये सफर कुछ अलग है

ये सफर कुछ अलग है
दिल के करीब है ।

दूरी लम्बी है ,
पर हर पल अज़ीज़ है।
जो लम्हें पीछे छूट गए
ये उन्हीं से मिलवाता है ।
चाहते हुए भी यह train
बड़ी waiting के बाद मिलती है।

बचपन की मस्ती
और बिंदास जवानी
सफर ले चलता है
उन पुरानी गलियों से
वो college का campus
और चाट के ठिकाने
नहीं दिख रहे वो दोस्त पुराने
पर यादें तो डट के वहीँ खड़ी हैं।

सफर ले चला मुझे
मेरे ही घर पे
पुराना सा घर है
पर यादों से तर है ।
प्यारे से mom dad
बाहें फैलाये खड़े हैं ।
वो माँ के हाथ का खाना
वही खुशब् पुरानी
भाई तो दूर है
पर इस घर में करीब है ।
वहीँ मेरा कमरा
वहीँ मेरी books हैं ।
अरे ..यहाँ तो कुछ भी न बदला ।

दिल तो ये चाहे
कुछ वक़्त और माँग लें
सफर के इस मोड़
पर ही रुक जाएँ ।
फिर याद आया
जीवन तो नदी सा
बहना ही जाने
चलना ही जाने ।
समेट के उन यादों को
फिर चल पड़े हैं ।

ये सफर कुछ अलग है
दिल के करीब है ।

© Shalu Makhija